शनिवार, 3 दिसंबर 2016

Disabled Persons in Indian context

Today, 3 Dec, is International Day of Disabled Persons.

According to 2001 census, we are having a huge population of disabled in our country. The number is 1,028,610,328 as in 2001. This number accounts for a total of 2.1 % of our total population, means out of every 100 people, 2 are disabled ones.
This may seem odd but we have failed as a society and a nation to respect them and facilitate them with better living conditions. Our town planning or infra or even building architecture is not as disabled friendly as it should be. Our public toilets are just a joke on the name of the facility. Only a disabled person can feel the pain while dealing with such infrastructural shortcomings.
This I am talking about basic needs only. If we talk about societal luxuries, they are starved for it. If a person with wheel chair wants to watch a movie in a multiplex, there are no proper arrangements. He / She must sit very next to the screen and just be the center of attraction of public which often leads to mocking.
If we talk of employment, they are even more starved there. Their total population vs working population ratio is an indicator that how bad we are as a society. This day is to remind us that they are no less than us. They might not have some organ / body part we have but we also do not have their point of view, their imagination, creativity and a lot of unexplored potentials.
Lets make a better society for future. Lets share love and respect, not sympathy. They do not sympathy. All they need is to get and appreciation for what they are.
Thank you for reading.

शनिवार, 18 जून 2016

जमाना कहता है मुझको पागल सा

वो गर्मियों की अलसाई साँझ औरआसमान पर लहराता हुआ छोटा सा टुकड़ा बादल का

उसकी छाँव में टहलते बच्चे खेलने जाते हुये, खेलकर आते हुये माथे पर ठहरा है पसीना हल्का सा

गिरधारी चचा के बाग़ में बैठी
कुहू कुहू करती कोयल
रंग है जिसका काजल सा

साथ में पढ़ी किताबों के पन्ने
जिनमें गुलाब की पंखुडियां रखी थीं
जिनमें खुशबु है बीते कल की

अक्सर ये सब देखते सोचते
कहीं खो जाता हूँ मैं
और जमाना कहता है मुझको पागल सा

:: अवनीश कुमार

रविवार, 27 सितंबर 2015

ऐ गनपत, चल दारु ला

और जब मैंने गणपति विसर्जन के डीजे में "ऐ गनपत, चल दारु ला" सुन लिया तब मुझको पक्का यकीन हो गया कि हमें विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
जरा महसूस करिये कितनी भक्ति डूबी है इस गीत में। भगवान और भक्त एकाकार हो गये हैं। भगवान शोषित वर्ग के प्रतिनिधि बन गये हैं। इस अवतार में वो बार टेंडर के स्वरूप में उतरे हैं। अपने भक्तों को सोमरस का वितरण करते हैं।
भक्त भगवान का दास नहीं है। आध्यात्मिक रूप से वो इतना उन्नत है कि भगवान को सीधा आदेश देता है कि ऐ गनपत, चल दारु ला यानि जा सोमरस लेकर आ। भक्त आधुनिक है उसे पता है कि भगवान से क्या क्या काम लिया जा सकता है। कोई वर्ग भेद नहीं है, कोई कर्म भेद नहीं है। महफ़िल सजी है, कभी साकी पिलाती थी, आज गनपत पिलायेंगे। आहा हा, क्या सुन्दर हिंदुत्व है।
ये जो पवित्र सोमरस है न, बड़े काम की चीज है। हमारे देव और भक्त इस रस के विशेष रसिक रहे हैं। वो तो नाश हो इन अंग्रेजों और म्लेच्छों का जो इसे सर्वसुलभ कर दिया। कालान्तर में सोमरस के भिन्न भिन्न संस्करण आये जिन्हें श्रद्धालुओं ने श्रद्धानुसार कभी शराब कभी बीयर तो कभी दारु कहा।
हे गनपत, इन म्लेच्छों को कभी क्षमा मत करना। पर उसके पहले - ऐ गनपत, चल दारु ला

बने रहो "भैया" और "बिहारी"

क्या इस बात पर कभी गौर किया है कि पूरे देश में हम यूपी बिहार वाले ही इतनी हेय दृष्टि से क्यूँ देखे जाते हैं. जब किसी का मन होता है यूपी बिहार वालों को गरिया लतिया लेता है. उसके बाद भी भर भर के हम लोग हर राज्य में पहुंचे रहते हैं. कभी सोचा है क्यों ?

हम समाजवाद, बहुजनवाद, मंडल और कमंडल के सताये हुये जीव हैं. ये जो हम गली गली घूमते हैं किसी शौक में नहीं घूमते. शौक में घूमते तो किसी में हिम्मत  न होती कि चूं कर सके. हम इसलिये भटकते हैं क्योंकि हमारे गृह राज्यों में हमारा कोई ठौर ठिकाना नहीं है. हम घर से १००० - २००० किलोमीटर दूर रहने के लिये अभिशप्त हैं. हर किसी को अपने घर से मोह होता है. इतना आसानी से नहीं छोड़ा जाता. पर छोड़ना पड़ता है.

इस समाजवाद, बहुजनवाद, मंडल और कमंडल की राजनीति में किसका भला हुआ और किसका बुरा हुआ वो एक अलग विषय है पर एक बात तो तय है कि उप्र और बिहार आज भी कमजोर और लाचार राज्य हैं, बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कुछ चमकती हुई सड़के हैं पर उतने से कुछ नहीं होता. बाकी राज्यों ने अगर खुद को सुधारा है, बुनियादी सुविधाओं का ध्यान दिया है और अपने यहाँ व्यवसायियों को आकृष्ट किया है तो उप्र बिहार ऐसा क्यों नहीं कर सकते.

 युवाओं को अपने गृहराज्य में ही रोजगार मिले इसके लिये आवश्यक है कि वहाँ पर रोजगार देने वाली कम्पनियां भी मौजूद हों. पर कम्पनियाँ क्यों नहीं आना चाहतीं. व्यवसाय के लिये जो सबसे जरुरी तत्व हैं वो उप्र  बिहार में बहुत बुरी हालत में हैं  -

१- अच्छी यातायात व्यवस्था
२- अच्छी कानून व्यवस्था
३- बिजली पानी की समुचित आपूर्ति
४- महिला सुरक्षा
५- बढ़िया मोबाईल और इंटरनेट कनेक्टिविटी
६- नवोन्मेष का सम्मान और सत्कार
७- सरकार और प्रशासन का सहयोगी रुख

इनमें से किसी भी मोर्चे पर उप्र बिहार कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडू आदि के सामने नहीं ठहरते. तो फिर कोई व्यवसायी अपना नुकसान कराने क्यूँ आयेगा. अगर हम ये करने में समर्थ नहीं हैं तो एडोब आगरा, गूगल गोरखपुर, माइक्रोसॉफ्ट पटना, ऑरेकल आरा, फ्लिप्कार्ट फ़ैजाबाद का सपना बस सपना ही रहेगा.

अगर हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ियों का हाल भी हमारे जैसा न हो तो हमें अपनी सरकारों पर इन बातों के लिये दबाव डालना होगा. नहीं तो फिर बने रहो "भैया" और "बिहारी"
 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

सोनवा के पिंजरा में

लड़की की विदाई से जुड़े गीतों की बात करें तो पहली भोजपुरी फिल्म "गंगा मैया तोंह्के पियरी चढ़ाईबैं" के गीत जितना मार्मिक और सुमधुर गीत मुझे कोई नहीं लगता.

इस गीत के बोल बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं और रफ़ी साहब ने गाकर इस गीत को अमर बना दिया है.

गीत के बोल हैं -

सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूट गईल डालियाँ छितर गईल छोटबा
छूट गईल नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा मां ...

छल\-छल नैंना निहारे चुपके रही
चलली बिदेसवा रे मईया के दुआर \-२
आँसुओं के मोतियाँ निसानी मोरे बाबुला \-२
धारी गईनी हमको रे पार
सोनवा के पिंजरा मां ...

छल\-छल रह गईली संग कि सहेलियाँ
ले गई बाँध के निठुर रे बहेलिया \-२
मोरे मन मितवा भुला दे अब हमरा के \-२
छोड़ दे मिलन की तू आस
सोनवा के पिंजरा मां ...