बुधवार, 3 अगस्त 2011

भगत सिंह की लेखनी से - 'युवक'

शहीदे आजम भगत सिंह आज भी युवकों के अनंत प्रेरणास्त्रोत हैं | यह लेख 'साप्ताहिक मतवाला' (वर्ष २,अंक ३८, १६ मई १९२५) में बलवंत सिंह के नाम से छपा था | केवल १७ वर्ष और कुछ महीने की उम्र में हिंदी मे लिखा यह लेख भगत सिंह की भाषा के ओज और लालित्य की एक मिसाल तो है ही ' युवाशक्ति की दिशा बोध के लिए भी एक प्रेरक बिंदु है | इस लेख की चर्चा 'मतवाला' के संपादक आचार्य शिवपूजन सही की डायरी में भी मिलती है |
           आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी का अंश (पृष्ठ २८) :
    "भगत सिंह ने 'मतवाला'(कलकत्ता) में एक लेख लिखा था ,जिसे सुधार-संवार कर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भंडार द्वारा प्रकाशित 'युवक साहित्य'में संग्रहीत भी मैंने ही किया था | वह लेख बलवंत सिंह के नाम से लिखा था | क्रांतिकारी लेख प्रायः गुमनाम लिखते थे | यह रहस्य किसी को ज्ञात नहीं | वह लेख युवक विषयक था | वह लाहौर से उन्होंने भेजा था | असली नाम की जगह 'बलवंत सिंह' ही छापने को लिखा था |"
       
                                                                   युवक

युवावस्था मानव जीवन का वसंतकाल है | उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो जाता है | हजारों बोतल का नशा छा जाता है | विधाता की दी हुई सारी शक्तियां सहस्त्र धारा होकर फूट पड़ती हैं | मदांध मातंग की तरह निरंकुश , वर्षाकालीन शोणभद्र की तरह दुर्ध्दर्ष , प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचंड , नवागत वसंत की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल , ज्वालामुखी की तरह उच्छृंखल और भैरवी संगीत की तरह मधुर युवावस्था है | जैसे क्रन्तिकारी की जेब में बमगोला , रण रस के रसिक वीर के हाथ में खड्ग , वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था |  १६ से २५ वर्ष तक हाड़ चाम के संदूक में संसार भर के हाहाकारों को समेट कर विधाता बंद कर देता है | युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुंधरा से भी सुन्दर है , पर इसके अंदर भूकम्प की सी भयंकरता भरी हुई है | इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए केवल दो ही मार्ग हैं - वह चढ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर या वह गिर सकता है अधःपात के अँधेरे खंदक में | चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक , चाहे तो विलासी हो सकता है युवक | वह देवता बन सकता है तो पिशाच भी बन सकता है | वही संसार को त्रस्त कर सकता है , वही संसार को अभयदान दे सकता है | संसार में युवक का ही साम्राज्य है | युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है | युवक ही रणचंडी के ललाट की रेखा है | युवक स्वदेश की यश दुन्दुभि का तुमुल निनाद है | युवक ही स्वदेश की विजय वैजयंती का सुदृढ दंड है | अगर किसी विशाल ह्रदय की आवश्यकता हो , तो युवकों के हृदय टटोलो | अगर किसी आत्मत्यागी वीर की चाह हो , तो युवकों से मांगो | रसिकता उसी के बांटे पड़ी है | भावुकता पर उसी का सिक्का है | वह छंदशास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी प्रतिभाशाली कवि है | कवि भी उसी के हृदयारविंद का मधुप है | वह रसों की परिभाषा नहीं जानता , पर वह कविता का सच्चा मर्मज्ञ है | सृष्टि की विषम समस्या है युवक | ईश्वरीय रचना कौशल का एक उत्कृष्ट नमूना है युवक | विचित्र है उसका जीवन | अदभुत है उसका साहस | अमोघ है उसका उत्साह |
     
         वह निश्चिंत है , असावधान है | लगन लग गयी है तो रात भर जागना उसके बाएं हाथ का खेल है , जेठ की दुपहरी चैत की चांदनी है | वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध कर दे , देश की लाली रख ले , राष्ट्र का मुखोज्ज्वल कर दे , बड़े-बड़े साम्राज्य उलट डाले | पतितों के उत्थान और संसार के उद्धारक सूत्र उसी के हाथ में हैं | वह इस विशाल विश्व रंगस्थल का सिद्धहस्त खिलाड़ी है |
  
           संसार के इतिहास के पन्ने खोल कर देख लो , युवक के रक्त के लिखे हुये अमर सन्देश भरे पड़े हैं | संसार की क्रांतियों और परिवर्तनों के वर्णन छांट डालो , उनमें केवल ऐसे ही युवक मिलेंगे , जिन्हें बुद्धिमानों ने पागल छोकरे अथवा पथभ्रष्ट कहा है | पर जो सिडी हैं वो क्या ख़ाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान से उन्मत्त होकर अपनी लोथों से किले की खाइयों को पाट देने वाले जापानी युवक किस फौलाद के टुकड़े थे | सच्चा युवक तो बिना झिझक के मृत्यु का आलिंगन करता है , संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है , तोप के मुंह पर बैठकर भी मुस्कुराता ही रहता है , बेड़ियों की झंकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फाँसी के तख्ते पर अट्टहासपूर्वक आरूढ़ हो जाता है |
               ऐ भारतीय युवक , तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है | उठ , आँखें खोल , देख , प्राची दिशा का ललाट सिंदूर रंजित हो उठा | अब अधिक मत सो | सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह |
                 तेरी माता , तेरी प्रातःस्मरणीया , तेरी परम वन्दनीया , तेरी जगदम्बा , तेरी अन्नपूर्णा , तेरी त्रिशूलधारिणी , तेरी सिंघवाहिनी , तेरी शस्यश्यामलांचला आज फूट-फूट कर रो रही है | क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती ? उठकर माता के दूध की लाज रख , उसके उद्धार का बीड़ा उठा , उसके आंसुओं की एक-एक बूँद की सौगंध ले , उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कंठ से - वंदेमातरम |

10 टिप्‍पणियां:

SAJAN.AAWARA ने कहा…

dayri ka ek ansh hame padhne ke liye sukriya....
jai hind jai bharat

G.N.SHAW ने कहा…

सुन्दर jagaruk post

दीप्ति शर्मा ने कहा…

bahut hi sunder post

vishwajeetsingh ने कहा…

भगतसिंह के विचारों से परिचय कराती एक दुर्लभ पोस्ट ...... आभार ।
www.vishwajeetsingh1008.blogspot.com

तरुण भारतीय ने कहा…

अविनाश भाई बहुत बहुत धन्यवाद ...बहुत ही अच्छी पोस्ट लगाई आपने .....अब आओ इस अभियान से जुडकर हर घर से भगत सिंह पैदा करो .......www.rajivdixit.com जरुर देखना ....

अवनीश सिंह ने कहा…

@तरुण भारतीय --> भाई मैंने राजीव जी के लगभग सारे व्याख्यान सुने हैं |www.rajivdixit.com, www.rajivdixit.in और youtube.com पर

कविता रावत ने कहा…

Bahut badiya sandesh.. Bhagat singh jaise naujawanon kee aaj desh ko sakht jarurat hai...
Saarthak prastuti ke liye dhanyavaad..
Haardik shubhkamnayen!

yogendra ने कहा…

अविनाश भाई भगतसिंह जी के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी पहले कभी नहीं पढ़ी ...इस श्रृंखला के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

yogendra ने कहा…

बहुत हि शानदार पस्तुति

पोस्ट पर आपका स्वागत है

संजय भास्कर ने कहा…

भगतसिंह बारे में काफी जानकारी मिली