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शनिवार, 20 जून 2015

पाठकीय समीक्षा - एक गधे की आत्मकथा / कृश्न चन्दर

“एक गधे की आत्मकथा” कृश्न चन्दर जी की बहुत ही सधी हुई व्यंग्य कृति है| आप पूरी पुस्तक पढ़ डालिये, फिर भी आप इसी पसोपेश में रहेंगे कि ये आदमी के रूप में गधा है या गधे के रूप में आदमी|
इस संग्रह में उन्होने गधे के माध्यम से पूरे सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक ढाँचे पर प्रहार किये हैं| मुख्य पात्र एक गधा है| उसी के मुख से सारी कहानी कही गयी है| कैसे वह बाराबंकी में ईंट ढ़ोने के काम से छुटकारा पाकर देश की राजधानी दिल्ली गया, कैसे वहाँ रामू धोबी से मुलाक़ात हुई, और रामू धोबी की मृत्यु के बाद उसके परिवार के भरण पोषण हेतु गधे ने कहाँ कहाँ चक्कर लगाये, कितनी ठोकरें और लातें खाईं, इन सब का बड़ा ही सजीव और रोचक वर्णन है| पुस्तक के प्रारम्भ में ही लेखक कहता है – “इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा”|



गधा रामू धोबी के यहाँ काम करने लगा था| एकाएक रामू की मृत्यु मगरमच्छ के हमले से हो जाती है| अब उसका परिवार भूखों मरने की हालत में आ जाता है| गधा मुसीबत के वक्त में उनका साथ देने का निश्चय करता है| गधे की खासियत है कि “वो इंसान की भाषा में बोलता है” | जब लोग आश्चर्य करते हैं कि ये तो गधा है, इंसान जैसा कैसे बोल रहा है तब कृश्न चंदर के लेखन का पैनापन देखने लायक है| उनका गधा तपाक से उत्तर देता है कि जब इंसान इंसान होकर गधों के जैसा बोल सकता है तो गधा इंसान जैसा क्यूँ नहीं बोल सकता| लेखक ने एक जगह लिखा है – “नई दिल्ली में ऐसे तो बहुत लोग होंगे जो इंसान होकर गधों की तरह बातें करते हों लेकिन एक ऐसा गधा, जो गधा होकर इंसानों की सी बात करे, हेडकान्स्टेबल ने आज तक देखा सुना न था।”
रामू के परिवार के लिये जीविका के बंदोबस्त के लिये बेचारा गधा इस कार्यालय से उस कार्यालय घूमते- घूमते परेशान हो जाता है| हर कोई उसे अगले ऑफिस भेजकर छुटकारा पा लेता है | वित्त मंत्री, मत्स्य विभाग, मजदूर यूनियन आदि से निराश होकर आखिर में गधा प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने का निर्णय करता है| नेहरू से गधे की मुलाक़ात बड़ी रोचक है| ज्ञान विज्ञान, पंचशील, पंचवर्षीय योजना आदि विषयों पर नेहरू और गधे का संवाद होता है| नेहरू गधे की सवारी भी करते हैं| फिर तो गधे की किस्मत ही बदल जाती है| उसके बाद तो वो गधा पूरे देश में प्रसिद्ध हो जाता है| विदेशी पत्रकार भी उसके साक्षात्कार लेते हैं| उसके बाद गधे के साथ क्या क्या होता है, बहुत ही रोचक घटनाक्रम है|
पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी है| भाषा प्रांजल और स्वाभाविक है, शैली मारक है| शोषित वर्ग के लिये सहानुभूति लेखक की हर पंक्ति से प्रकट होती है| गधे को माध्यम बनाकर लेखक ने सौदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन पर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं| सौंदर्य की परिभाषायें दी हैं| एक बड़ा मजेदार प्रसंग है जब गधा साहित्य अकादमी की बैठक में पहुँच जाता है| गधा सवाल करता है कि उनके लिये आप क्या कर रहे हैं जो बहुत अच्छा लिख सकते थे पर भूख और गरीबी ने उन्हें लिखने नहीं दिया|
उदाहरणस्वरूप पुस्तक के कुछ अंश प्रस्तुत हैं:
1- बाराबंकी से दिल्ली यात्रा के बीच:
“मौलवी- अच्छा, यह बताओ, तुम हिन्दू हो या मुसलमान ? फिर हम फैसला करेंगे।
मैं-हुजूर, न मैं हिन्दू हूं न मुसलमान। मैं तो बस एक गधा हूं और गधे का कोई मज़हब नहीं होता।
मौलवी-मेंरे सवाल का ठीक-ठीक जवाब दो।
मैं-ठीक ही तो कह रहा हूं। एक मुसलमान या तो हिन्दू गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता।
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2- गधे का दिल्ली आगमन और उसके द्वारा देखी गयी दिल्ली
//दिल्ली का भूगोल
“इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था,
असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ “
मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा।“
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“दिल्ली में नई दिल्ली है और नई दिल्ली में कनाटप्लेस है। कनाटप्लेस बड़ी सुन्दर जगह है। शाम के समय मैंने देखा कि लोग लोहे के गधों पर सवार होकर इसकी गोल सड़कों पर घूम रहे हैं। यह लोहे का गधा हमसे तेज़ भाग सकता है, परन्तु हमारी तरह आवाज़ नहीं निकाल सकता। यहां पर मैंने बहुत से लोगों को भेड़ की खाल के बालों के कपड़े पहने हुए देखा है। स्त्रियां अपने मुँह और नाखून रंगती हैं, और अपने बालों को इस प्रकार ऊंचा करके बांधती हैं कि दूर से वे बिल्कुल गधे के कान मालूम होते हैं। अर्थात् इन लोगों को गधे बनने का कितना शौक है, यह आज मालूम हुआ।“
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“यह तो कोमलांगियों की मजबूरी है कि वे सदा सुन्दर गधों पर मुग्ध होती हैं| “
~ पद्म भूषण कृश्न चन्दर (1914-1977)

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

खम्मा / अशोक जमनानी


खम्मा / अशोक जमनानी

किसी भी स्थान पर बसने वालों की संस्कृति से परिचित होना हो तो इसका सबसे सटीक तरीका वहाँ के लोकगीत हैं| लोकगीतों मे लोक की परम्परा निहित होती है| उस क्षेत्र का भूगोल, इतिहास, समाज का तानाबाना, रीतिरिवाज सब कुछ सिर्फ लोकगीतों के सूक्ष्म अध्ययन से पता किये जा सकते हैं| किसी क्षेत्र विशेष के गीतों में वहाँ की स्थानीय वनस्पतियों के नाम, वहाँ के पशुओं के नाम और पहाड़, नदी व अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं| और इन गीतों की जो सबसे बड़ी खासियत है वो यह कि ये जनसाधारण के गीत हैं, इनके लिये किसी विद्वता की आवश्यकता नहीं| ये धनिकों के लिये आरक्षित गीत नहीं हैं, ये सदियों से धरा पर गूँजते हुये गीत हैं जिनमें हमारा आपका इतिहास छुपा है| इन लोकगीतों और लोककलाओं का अपना स्वयं का भी एक इतिहास है| चारण भाट परम्परा से लेकर अल्हैत (आल्हा गाने वाले) और मांगणियार आदि सब इसी परम्परा का हिस्सा हैं| इस अमूल्य धरोहर को सँजोकर रखने की आवश्यकता है और इसका अध्ययन करने की भी बहुत जरूरत है|

इसी परिप्रेक्ष्य में एक कोशिश है अशोक जमनानी का उपन्यास ‘खम्मा’| जमनानी जी ने सतह पर न टिककर डूबने की कोशिश की है और संवेदनाओं में डूबकर वो जो कुछ समेट पाये हैं उसे उन्होने खम्मा में वर्णित किया है| उपन्यास प्रारम्भ करने से पहले ही उन्होने गाँधी जी को उद्धृत किया है| गाँधी जी के अनुसार, लोक-गीत संस्कृति के पहरेदार हैं|







पूरा उपन्यास इसके नायक बींझा के इर्द-गिर्द केन्द्रित है| यहाँ बींझा को समझना उपयुक्त होगा| बींझा मांगणियार परम्परा का आधुनिक चेहरा है, उसके अंदर पारम्परिक कलाकार है, अच्छा सुर है पर वो इस परम्परा के बोझ से मुक्त होना चाहता है| इसलिये नहीं कि उसे गीत संगीत नहीं रुचता बल्कि इसलिये कि उसका आत्मसम्मान खंडित होता है बख्सीस लेने में, हुकुम हुकुम, खम्मा खम्मा करने में| उसका कलाकार सुलभ आत्म सम्मान उसे कहीं भी झुकने से रोकता है| आधुनिक व्यवस्था अपने रोजगार के विकल्पों के साथ उसे आकर्षित करती है| वो शहर का रास्ता नापता है और विदेश जाने के ख्वाब भी रखता है| और पूरी कथा इन्हीं ख्वाबों की है|

कथा के अन्य पात्र हैं मरुखान(बींझा के पिता), सोरठ(बींझा की पत्नी), सूरज(राजपूतों की नयी पौध का प्रतीक), सुरंगी, झाँझर, क्रिस्टीन व ब्रजेन| सारे पात्र परिस्थितियों से जूझते हुये बड़े ही सुंदर दिखाई देते हैं| इन पात्रों में एक चीज ध्यान देने योग्य है| सारे पात्र सकारात्मक रवैये वाले हैं, किसी-2 क्षण कहीं किसी पर नकारात्मकता हावी भी हुई तो बस क्षणिक| उसके बाद फिर से ये जीवन को आशावादी नजरिये से देखने लगते हैं| सबके अंदर जिजीविषा है और साहस भी है| सुरंगी व झाँझर ने जमाने से दबने के बजाय जमाने के दाँव पेंच सीख लिये हैं जो उन्हें ऊर्जा व हिम्मत देता है| उपन्यासकार को अलग से कुछ कहने कि कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती| उसके पात्र इतने सजीव हैं कि सारी बात वे खुद कह जाते हैं|

विचारधारा ढूँढने वालों को यहाँ निराशा हाथ लगेगी| लेखक ने किसी वाद के लिये नहीं लिखा है| लेखक ने एक परम्परा के दीपक की बुझती हुई लौ के बारे में लिखा है, परम्पराओं मे विश्वास करने वाले अपनी विचारधारा यहाँ तलाश सकते हैं| लेखक ने वंचित (शोषित नहीं, शोषित और वंचित में बहुत फर्क है) वर्ग के बारे में लिखा है, वंचितों की बात करने वाले अपनी विचारधारा यहाँ देख सकते हैं| पर इन सबसे ऊपर लेखक ने एक बेहतर कल के सपनों और उम्मीदों के बारे मे लिखा है और सपनों की कोई विचारधारा नहीं होती|

पूरी कथा में एक द्वंद है पुरातन का नवीन से, आदर्श का लोभ से, पूंजी का संस्कृति से, लोकरंग का सिनेमाई रंग से, प्रेम का वासना से| इन द्वंदों के बीच राजपूतों और मांगणियारों के सम्बन्ध को नये संदर्भ में समझने कि चेष्टा है और इन सम्बन्धों के पुनर्परिभाषित होने का द्वंद पूरी कथा में सशक्त रूप से विद्यमान है| वर्तमान संदर्भ में राजपूतों और मांगणियारों के बीच उच्च और निम्न का रिश्ता अप्रासंगिक और त्याज्य है| कलाकार और रसिक के बीच मैत्री का रिश्ता होना चाहिये और अशोक जी यह संदेश देने मे सफल हैं|

उपन्यास का कथानक गतिशील है और पाठक की उत्सुकता बनाये रखने का पूरा जतन किया गया है| कथा कहीं भी बोझिल नहीं है| धोरे-टीले, खड़ताल, मोरचंग, कमायचा, बींदणी, चानंण पख, अंधार पख, पीवणा आदि शब्द एक पूरे सांस्कृतिक परिवेश की सृष्टि करते हैं| बीच-बीच में मोतियों की भाँति सजे गीत पाठक को कहीं और ले जाते हैं, संगीत और प्रेमकहानियाँ मिलकर एक अलग ही भाव प्रस्तुत करती हैं| और वो भाव हमेशा सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने के प्रति सजग करते हैं और यही इस उपन्यास की सफलता है|

अन्त में उपन्यास से कुछ चुने हुये अंश:

1- औरत जिंदगी में आगे तो बढ़ती है लेकिन पीछे छूटे का मोह नहीं छोड़ पाती| बार-बार पलटकर देखती है| (पृष्ठ 66 )

2- जिस कलाकार के दिल को ठेस लगी होती है उसका हुनर केवल हुनर कहाँ रह जाता है? उसके हुनर को तो उसकी पीर, पीर बना देती है| (पृष्ठ 71)


3- एक बात मैं साफ-2 बता दूँ चाहे किसी को मेरा हुनर कितना भी अच्छा क्यों न लगे मैं अपना मेहनताना तो ले सकता हूँ लेकिन बख्सीस या भीख मुझे मंजूर नहीं है| न कभी ली है और न कभी लूँगा| (पृष्ठ 93)

4- दो मरद साथ में रहें तो घर की हालत बिगाड़ दें लेकिन दो औरतें एक घर में हों और घर गंदा रहे तो समझ लेना कि दोनों के दिल में बैर है| (पृष्ठ 94)

5- धोरे टीलों की किस्मत में विधाता ठहराव कहाँ लिखता है| धोरे टीले जिनके पैरों से लिपटते हैं वो भी उनकी शक्ल बिगाड़ कर आगे बढ़ जाते हैं| जिन्हे वो अपनी गोद में बहुत मुहब्बत के साथ पनाह देते हैं वो भी बैठे बैठे बेवजह ही उनके साथ खिलवाड़ करते रहते हैं| हर एक आमद धोरे टीलों का रूप बिगाड़ती है और शायद उन्होने भी इसे किस्मत का लिखा मानकर सब कुछ सहने का मन तो बना लिया है| लेकिन कहीं न कहीं एक टीस बाकी है इसलिये ये धोरे-टीले धीमे धीमे सरकते हैं और कभी कोई बेखुदी मे उनकी कगार पर पहुँच जाता है तो उसे लेकर इस तरह फिसलते हैं कि वो रेत में डूबा शख़्स जब उबरता है तो धोरे-टीलों का मन उसे देखकर देर तक खिलखिलाता है| लेकिन इन्हीं कगारों पर रहे ऊँटों से धोरे-टीलों का एक समझौता सा हो गया है, वो उन्हे नहीं गिराते| जब तेज हवायें धोरे-टीलों का रूप रूप बिगाड़ती हैं और उनकी रेत उड़कर न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है तब ये ऊंटों के कारवाँ ही तो हैं जो वहाँ जा जा कर धोरे-टीलों की बिछड़ी रेत को उनके बिछड़े हुओं का संदेशा सुनाते हैं और वहाँ इनके पाँव से लिपटकर वो रेत उनसे मिल लेती है जिनसे बिछड़े हुये जमाना बीत चुका होता है| शायद इसी रिश्ते की दुहाई लेकर ऊँट इन धोरे-टीलों पर बेफिक्र होकर चलते हैं| (पृष्ठ 106 )

6- लेकिन कुछ कलाकार हैं जो किसी के आगे सिर नहीं झुकाते| उनकी आवाज में वो नूर होता है जो लोगों की रूह तक पहुंचता है| ( पृष्ठ 155 )

7- मांगणियार नहीं गाते, माडधरा गाती है मांगणियारों के गले में उतरकर (आवरण पृष्ठ)