शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

काश !

बचपन से लेकर आज तक ये  सुनते आ रहे हैं कि,
हम  बदल रहे हैं,हम परिवर्तन चाहते हैं
रूढ़िवाद,जातिवाद,क्षेत्रवाद सब से छुटकारा चाहते हैं
ये भी सुना था ,
 हम बदलेंगे ,युग बदलेगा,बदलेगा ये हिन्दुस्तान
पर आज सोचता हूँ,
क्या हम सचमुच बदलना चाहते हैं?
बदलना भी तो कैसे?
हम तो आज भी नहीं बदले,
वहीं खड़े हैं दशकों पीछे,सदियों पीछे

प्रश्न ये है की हम क्यों बदलें
क्यों करें ये परिवर्तन,क्यों बदलें ये हिन्दुस्तान
हम नहीं बदलेंगे क्योंकि हम तो हिंदू या मुसलमान हैं,
हम तो  सिख या ईसाई हैं ,
कौन कहता है की हम भाई भाई हैं
क्यों दें हम किसी को सम्मान ,
हमें तो अपना अहं प्यारा है
क्यों ना करें हम एक दूसरे का अपमान
क्यों ना फैलाएं हम दंगे प्रतिदिन,
यह तो जन्मसिद्ध अधिकार हमारा है
हम दंगे करेंगे , मारपीट करेंगे
अपने राज्य में दूसरे राज्य की भाषा नहीं सुनेंगे
क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र का कोई महत्त्व नहीं है
हम पहले भाषा हैं , राज्य हैं , संप्रदाय हैं,
राष्ट्र उसके बाद कहीं है\
हम जातिवाद फैलायेंगे , क्षेत्रवाद फैलायेंगे
राष्ट्रभाषा में शपथपत्र पढ़ने पर हंगामा करेंगे
हम क्यों बदलें ,हम नहीं बदलेंगे \

       पर कब तक ?
       आखिर कब तक ?
कब तक भाषा , धर्म और जाति का रोना रोयेंगे?
कब तक दंगे फसाद करके अपने ही भाइयों का खून बहायेंगे?
कब तक हम एक दूसरे से दूर रहेंगे?
कब तक अपना प्यार सबसे नहीं बाँटेंगे?
       हमें बदलना ही होगा
जात-पाँत,भाषा,क्षेत्र जैसी नफरत की दीवारों को गिराना ही होगा\
"वसुधैव कुटुम्बकम" के अनुयायी अपने ही कुटुंब से दूर क्यों?
         हमें बदलना होगा
पर क्या हम ये परिवर्तन कर पायेंगें?

काश ! हम बदल जाते ,
सब कुछ भूलकर सबके गले लग जाते
सबको प्यार देते और सबसे प्यार पाते
सबके साथ सुख और दुःख बांटते
सबके दर्द में मरहम बन जाते
     
           काश ! हम बदल जाते,
                 
              काश !

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

परोपकार का रास्ता

बहुत पुरानी बात है। फिलाडेल्फिया में फ्रैंकलिन नामक एक गरीब युवक रहता था। उसके मोहल्ले में हमेशा अंधेरा रहता था। वह रोज यह देखता था कि अंधेरे में आने-जाने में लोगों को बहुत दिक्कत होती है।
एक दिन उसने अपने घर के सामने एक बांस गाड़ दिया और शाम को उस पर एक लालटेन जला कर टांग दिया। लालटेन से उसके घर के सामने उजाला हो गया। लेकिन मोहल्ले के लोगों ने इसके लिए उसका मजाक उड़ाया। एक व्यक्ति बोला, ‘फ्रैंकलिन, तुम्हारे एक लालटेन जला देने से कुछ नहीं होगा। पूरे मोहल्ले में तो अंधेरा ही रहेगा।’
उसके घर वालों ने भी उसके इस कदम का विरोध किया और कहा, ‘तुम्हारे इस काम से फालतू में पैसा खर्च होगा।’ फ्रैंकलिन ने कहा, ‘मानता हूं कि एक लालटेन जलाने से ज्यादा लोगों को फायदा नहीं होगा मगर कुछ लोगों को तो इसका लाभ मिलेगा ही।’ कुछ ही दिनों में इसकी चर्चा शुरू हो गई और फ्रैंकलिन के प्रयास की सराहना भी होने लगी। उसकी देखादेखी कुछ और लोग भी अपने-अपने घरों के सामने लालटेन जला कर टांगने लगे।
एक दिन पूरे मोहल्ले में उजाला हो गया। यह बात शहर भर में फैल गई और म्युनिसिपल कमेटी पर चारों तरफ से यह दबाव पड़ने लगा कि वह उस मोहल्ले में रोशनी का इंतजाम अपने हाथ में ले। कमेटी ने ऐसा ही किया। इस तरह फ्रैंकलिन की शोहरत चारों तरफ फैल गई। एक दिन म्युनिसिपल कमेटी ने फ्रैंकलिन का सम्मान किया। इस मौके पर जब उससे पूछा गया कि उसके मन में यह खयाल कैसे आया, तो फ्रैंकलिन ने कहा, ‘मेरे घर के सामने रोज कई लोग अंधेरे में ठोकर खाकर गिरते थे। मैंने सोचा कि मैं ज्यादा तो नहीं लेकिन अपने घर के सामने थोड़ा तो उजाला कर ही सकता हूं। हर अच्छे काम के लिए पहल किसी एक को ही करना पड़ती है। अगर हर कोई दूसरे के भरोसे बैठा रहे तो कभी अच्छे काम की शुरुआत होगी ही नहीं।