सोमवार, 11 अगस्त 2014

हर बहाना ढूँढता है

 मेघ घने छा गए, उजाले को खा गए
दिशा सूझती नहीं, नजर कुछ बूझती नहीं
अँधियारा है और वो ठिकाना ढूँढता है
गम को छिपाने का हर बहाना ढूँढता है


कल को जो सतेज था,और आज जब निस्तेज है
कल जो रखता धीर था, आज अति अधीर है
इस सफ़र के बीच का सारा फ़साना ढूँढता है
गम को छिपाने का हर बहाना ढूँढता है

बाहर की हो चोट तो होता नहीं कोई असर
अन्दर की चोट हो अगर, तो करें कैसे बसर
इस चोट के इल़ाज को, वो दवाखाना ढूँढता है
गम को छिपाने का हर बहाना ढूँढता है।

---- अवनीश सिंह

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

A Memoir

यूँ तो दोस्ती के लिए महज़ एक दिन मुक़र्रर कर देना कोई ख़ास समझदारी का काम तो है नहीं. लेकिन जब चलन चल ही पड़ा है तो इस दिन को मैं किसी ख़ास दोस्त की शुक्रगुजार होने का मौका जान कर कबूल कर रही हूँ.
अक्टूबर / नवम्बर 2012 की बात है. किताबों से सम्बंधित एक ग्रुप ज्वाइन किया था. उसमे किसी पोस्ट पर इन से परिचय हुआ. फिर इनबॉक्स में बातें होने लगी. वो मेरा फेसबुक पर शुरूआती वक्त था सो बेतहाशा झिझक थी. मेरे ही हमउम्र इस मित्र ने मेरी झिझक को बेहद शिष्टता से दूर किया. मुझे फेसबुक की कई बुनियादी बातें सिखाई. जैसे कमेंट में नाम टैग करना, चैट ऑफ करना, हिंदी में टाइपिंग करने वाले टूल का लिंक देना, उसे डाउनलोड करने का तरीका सिखाना, और भी बहुत कुछ. लेकिन जो सब से बड़ा एहसान उन का मुझ पर है वो ये कि उन्होंने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया. प्रेरित क्या किया एक तरह से बांह मरोड़ कर मजबूर किया. मैंने शुरू शुरू में लिखा आस्था वाला नोट हो या किताबों वाली पोस्ट, सब उन्हीं की देख रेख में हुआ. वो मेरे प्रूफ रीडर भी थे और पहले पाठक भी. लिखना तो शायद मुझे आता था लेकिन इस काम में जो आत्मविश्वास की दरकार होती है वो बिल्कुल नदारद था. उन्होंने उस आत्मविश्वास को मेरे अन्दर प्रज्वलित किया. आज जब भी कोई अनजान व्यक्ति मेरे इनबॉक्स में आ कर कहता है कि 'आप बहुत अच्छा लिखती हो' तो उन की बरबस याद आ जाती है. और दिल से उन के लिए दुआ निकलती है.
उन ख़ास मित्र का नाम है अवनीश कुमार जी. आज कल इन का फेसबुक पर आना बहुत कम हो गया है.
मैं आज के दिन अपने दिल की तमामतर गहराइयों के साथ आपका शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ अवनीश जी. मैंने तो आपको सिवाय सर-दर्द के कुछ नहीं दिया लेकिन आपने मुझे वो अता किया है जिस के लिए मैं चाहकर भी आपके एहसान से मुक्त नहीं हो सकती. ये जो मेरा लम्बा-चौड़ा फेसबुक परिवार है वो सिर्फ और सिर्फ आपकी बदौलत है.
आप का, आपकी अनगिनत नवाजिशों का दिल से शुक्रिया. आप खुश रहें, शाद रहें, आबाद रहें यही दुआ है.
-- Zaara Khan

रविवार, 5 जनवरी 2014

हर क्षण हर दिन



महानगरों की भीड़ में
पसीने से तर बतर
कहीं भाग जाने की जल्दी में
बदहवास से चेहरों पर
लिखी इबारतें पढ़ते हुये

सड़कों और रेल की पटरियों पर
चीखते वाहनों की आवाज में
कारखानों के धुंवे को देखते हुये
और मशीनों की खटपट को
सुगम संगीत सा सुनते हुये

लोगों के क़हक़हों में बसी
लोगों के शोरगुल में छिपी
अनकही सी गहराती हुई
खामोशी को महसूस करते हुये 

कई दिनों के बाद कभी
एकान्त मिलने पर
उमस में कभी
बारिश की दो बूंद पड़ने पर
उस खुशी को महसूस करते हुये

अक्सर यही खयाल आता है
कि क्या यही सच है जीवन का
भागना एक अंजाने गन्तव्य की ओर
उलझना
, सुलझना, घबराना, टकराना
गिरना
, उठना और फिर सरपट दौड़ना

खेलना मशीनों से दिन रात
गुम होती आपस की बात
दौड़ में भूलते हुये पड़ाव
छूटता हुआ प्रकृति का साथ

कम होता पुष्पों से प्रेम
भूल रही पीपल की छाँव
विस्मृत होता सौंदर्य बोध
भूल गये कुएं और गाँव 

ये दौड़ तो सच नहीं
ये दौड़ है बस एक छलावा
और हम हर क्षण हर दिन
छ्ले जा रहे हैं
फिर भी और तेजी से
हम हम हर क्षण हर दिन
चले जा रहे हैं

बुधवार, 20 नवंबर 2013

प्रतिमायें

[ प्रतिमायें ]
एक गाँव के पास एक विशेष जगह थी| वहाँ बड़ी बड़ी गगनचुंबी प्रतिमायें खड़ी थीं| प्रतिमायें इतनी ऊँची थीं कि उनका चेहरा भी साफ दिखाई नहीं देता था| इतनी विशाल थीं कि गाँव वाले उनके चरणों से आगे कुछ देख ही नहीं पाते थे| और उन्हीं चरणों की रज लेकर खुद को धन्य समझते थे| उनके बारे में बड़ी कहानियाँ प्रचलित थीं| सब अपने-2 कर्मक्षेत्रों के महान देवता थे| उनकी बड़ी धाक थी| कभी किसी गँवार को उनकी महानता पर शक भी होता तो बाकी सारे अंधभक्त उसको डांट डपट कर चुप करा देते| और उनकी महानता पर उठने वाला कोई प्रश्नचिन्ह उनपर लगने से पहले ही अपनी मौत मर जाता है| गाँव वाले उनकी बहुत इज्जत करते|
ये सिलसिला दशकों तक चला| फिर अचानक गाँव की हवा को जाने क्या हो गया, बहुत तेज बहने लगी| उस स्थान विशेष की जमीन भी सरकने लगी| भव्य प्रतिमायें हिलने लगीं, कुछ तो धीरे-2 जमीन में भी धँसने लगीं| उनके चेहरे भी दिखाई देने लगे| गाँव वाले दौड़े दौड़े आये और ये देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि सारी मूर्तियाँ हद दर्जे की नकली थीं| उनके चेहरे की जगह कई सारे नकाब थे, प्याज के छिलकों की तरह गाँव वालों ने एक के बाद एक के नकाब उतारे और असली चेहरा भी देखा| भद्दा और घिघौना चेहरा| गाँव वालों ने ये भी देखा कि एक प्रतिमा के कपड़े उतरे हुये हैं और अन्य प्रतिमायें अपने अपने कपड़े उसे दे रही हैं| नतीजतन सारी प्रतिमायें नग्नावस्था में पड़ी थीं|
अब गाँव वाले इन खंडित मूर्तियों से छुटकारा पाने की सोच रहे हैं| साथ ही साथ अपनी खंडित आस्थाओं से भी| पर कुछ गाँव वाले अभी भी अपने देखे पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं| ये सोच रहे हैं कि ये तूफान की साजिश है, जमीन के खिसकने के पीछे भी कोई साजिश है और उन प्रतिमाओं को दुबारा स्थापित करने के पक्ष में हैं|
प्रतिमाओं का क्या होगा ये इस पर निर्भर है कि गाँव वाले अपनी आँखों देखी पर यकीन करेंगे या अंधभक्ति के सागर में गोते लगायेंगे|
- अवनीश कुमार

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

हम प्रगति कर रहे हैं


हम प्रगति कर रहे हैं

सदियों पुरानी अँधेरी दुनिया के,
अँधेरे को ललकार रहे हैं
अँधेरे में डूबे लोग
अँधेरे मिटाने में लगे हैं

यह सदी है रौशनी के आधिक्य की,
उजाला इतना ज्यादा है
आँखों में इतना चमकता है
कि आँखें चौंधिया गयी हैं
कुछ सूझता ही नहीं
इस उजाले के अंधेपन से
कोई जूझता भी नहीं

ये उजाले के मायाजाल में
कौन है जो हमें लूट रहा है
अभी तनकर खड़े भी न हुये
अभी से नींव में क्या टूट रहा है

उजालों में परछाईं बन हर रोज बिखर रहे हैं
हाँ, हम प्रगति कर रहे हैं